बस्तर में मिली 400 मीटर लंबी गुफा, ट्रैकिंग की भी सुविधा

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बस्तर। छत्तीसगढ़ घूमने आने वालों लोगों को अब यहां घूमने में और मजा आने वाला है। कारण है बस्तर में वन विभाग को 400 मीटर लंबी गुफा मिली है, जो अब यहां घूमने आने वालों के लिए घूमने का नया ठिकाना होगी। यह गुफा खूबसूरत है। बताया जा रहा है कि वन विभाग इसे अगले हफ्ते से पर्यटकों के लिए खोल देगा। यहां ट्रैकिंग की भी सुविधा जी जाएगी।

दरअसल, बस्तर में 200 वर्ग किमी में फैली कांगेर वैली घाटी में स्थित कुटुमसर गुफा के भीतर एक नई गुफा मिली है। ये 350 से 400 मीटर लंबी और पुरानी गुफा से 25 फीट ऊपर है। कुटुमसर गुफाएं जगदलपुर से लगभग 40 किमी दूर है। कांगेर वैली घाटी में बड़ी संख्या में लोग घूमने पहुंचते हैं।

अगर इस गुफा के तापमान की बात की जाए तो कुटुमसर गुफाओं में बाहर के तापमान और गुफा के अंदर का तापमान में 15 से 20 डिग्री का अंतर रहता है। गर्मी में गुफा बाहर की तुलना में ठंडी और सर्दी में गर्म रहती है। साथ ही नई गुफा में भी कैल्शियम कार्बोनेट से लाखों साल में तैयार पत्थरों की अद्भुत आकृतियां हैं, जो लोगों को देखने में काफी पसंद आने वाली हैं।

यहां आसपास की दंडक, कैलाश, देवगिरि और कुटुमसर समेत 12 गुफाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। फिलहाल यह तलाश जारी है कि ये नई गुफा किस गुफा से जुड़ी हुई है। वहीं रेडियो कार्बन डेटिंग के जरिए इसकी उम्र का पता लगाया जाएगा। कहा जा रहा है कि गुफा में समुद्री जीवों के अवशेष तक मिले हैं।

अधिकारियों के मुताबिक गुफा में हमेशा अंधेरा होने के कारण यहां के जीव-जन्तु बाहरी दुनिया से कुछ अलग हैं। यहां पाए जाने वाले मेंढ़क बाहरी दुनिया से अलग प्रजाति के हैं। यहां की अंधी मछली भी की एक विशेषता है। कुटुमसर को वर्ल्ड हैरिटेज में शामिल करने के लिए पहले एक बार प्रपोजल दिया गया था। कुछ कमियां होने के कारण अब फिर से उन्हें दूर कर फिर से प्रस्ताव भेजा जाएगा।

कांगेर वैली नेशनल पार्क के डायरेक्टर धम्मशील गणवीर ने बताया कि नई गुफा के अंदर ऑक्सीजन लेवल सामान्य है, लेकिन अंदर उन्हीं युवाओं को भेजा जाएगा जो पूरी तरह स्वस्थ हों और अंधेरे आदि से न डरते हों। कांगेर नदी के कारण इस राष्ट्रीय उद्यान का नाम रखा गया है। पूरा राष्ट्रीय उद्यान गोदावरी नदी का जलग्रहण क्षेत्र है।

गुफा के अंदर की बेहतरीन तस्वीर लेने वाले मोहम्मद अंजार नबी ने बताया कि यहां फोटो लेना आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि अंदर अंधेरे में फोटो लेने के लिए उन्होंने एलईडी लाइट की मदद से रोशनी को सेट किया। फिर साफ और तस्वीर लेने के लिए कैमरे को ट्राईपॉड पर सेट किया गया। इसके बाद कैमरे को हाई आईएसओ पर फिक्स करके तस्वीरें ली गईं हैं। इस दौरान फोटो लेने में काफी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा।

इसे लेकर बस्तर यूनिर्वसिटी के जूलॉजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर अमितांशु शेखर झा ने बताया कि कुटुमसर की हर गुफाओं की ऊंचाई अलग-अलग है। इसके कारण के बारे में ये कहा जा सकता है कि गुफा के अंदर की संरचनाओं को देखने से लगता है कि करोड़ों साल पुरानी इस गुफा कई चरणों में बनकर तैयार हुई होगी। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक कारणों से गुफा के अंदर कई बार टूट फूट हुई। फिर लाखों साल में प्राकृतिक रूप से इसका निर्माण हुआ। इसके कुछ समय बाद गुफाएं फिर टूटीं, फिर बनीं। इस तरह से कई बार ये क्रम चला होगा। यहां करीब 110 करोड़ साल पहले के समुद्री कवक के अवशेष भी मिले हैं।

गुफा में ये है खास, बरसात में बंद रहता है

  • चूना पत्थर के रिसाव, कार्बन डाईऑक्साइड, पानी की रासायनिक क्रिया से सतह से लेकर छत तक प्राकृतिक संरचनाएं बनी हैं।
  • इस गुफा को पहले गोपनसर कहते थे, जो बाद में कुटुमसर गांव के नजदीक होने से कुटुमसर गुफा के नाम से प्रसिद्ध हुई।
  • कुटुमसर की गुफाओं को भारत की सबसे पहली जैविक रूप से खोजी गई गुफा होने का गौरव प्राप्त है।
  • इस गुफा में रंग बिरंगी अंधी मछलियां पाई जाती हैं, जिन्हे प्रोफेसर के नाम पर कप्पी ओला शंकराई कहते है।
  • गुफाओं में ज्यादा गहराई तक जाने पर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। वहीं बारिश के मौसम में गुफा 15 जून से 31 अक्टूबर तक बंद रहती है।
  • कांगेर घाटी की यात्रा के लिए सबसे अच्छा मौसम नवंबर से जून के मध्य तक है।